भगवान परशुराम जयंती , विष्णु जी के छठे अवतार की रोचक कथा । पूजा विधि।

भगवान परशुराम जयंती , विष्णु जी के छठे अवतार की रोचक कथा ।







भगवान परशुराम जयंती  विष्णु जी के छठे अवतार की रोचक कथा ।

नमस्कार दोस्तों 

आज हम ऐसे महान पुरुष के बारे में जानने वाले है, जिनके बारे में कहा जाता है वह आज भी इस दुनिया में है। 

हम बात कर रहे है भगवान परशुराम जी की, जो विष्णु जी के अवतार है। 
जब भी सृष्टि में अधर्म बढ़ता है ओर धर्म की हानि होती है। तब - तब विष्णु जी इस जगत में आते है । दुष्टों, असुरों का नाश करने के लिए, ओर धर्म की स्थापना के लिए। ऐसे ही अवतारों में से एक है, भगवान परशुराम ।

भगवान परशुराम - विष्णु जी के छठे अवतार । ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी एक महान योद्धा बने। शिव जी के परम भक्त रहे ओर अधर्मी क्षत्रियों का नाश करके, धर्म की रक्षा की। 

परशुराम जयंती 2026 इस बार 19 अप्रैल 2026 , रविवार को है।यह तिथि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को पड़ रही है, जो अक्षय तृतीया के साथ भी जुड़ी हुई है। तृतीया तिथि 19 अप्रैल को सुबह लगभग 10:49 बजे शुरू होगी और 20 अप्रैल को सुबह 7:27 बजे समाप्त होगी। इसलिए जयंती 19 अप्रैल को ही मनाई जाएगी।

इस विशेष अवसर पर हम भगवान परशुराम की जीवन गाथा, उनके जन्म की कथा, माता रेणुका वध व पिता जमदग्नि की हत्या का बदला, 21 बार अधर्मी क्षत्रियों का संहार, महान योद्धा होने के बावजूद ब्राह्मण होने की गरिमा , रामायण - महाभारत में उनकी भूमिका ओर चिरंजीवी होने का रहस्य विस्तार से जानेंगे।
यह कथा सिर्फ पुराणों की कहानी नहीं, गुरु भक्ति , माता - पिता के प्रति कर्तव्य, धर्म रक्षा ओर क्रोध को वश में करने की अनमोल सीख देती है 
आइए, भक्ति और श्रद्धा के साथ इस महान कथा में गोता लगाते हैं।

भगवान परशुराम का जन्म ओर बचपन 

भगवान परशुराम का जन्म भृगु वंश में हुआ था। पिता जमदग्नि बड़े तपस्वी ऋषि ओर माता रेणुका अत्यंत पतिव्रता ओर सती थी।  कथा है कि,एक बार ऋषि जमदग्नि ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया ओर देवराज इंद्र ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया कि उन्हें एक दिव्य पुत्र की प्राप्ति होगी । इसी यज्ञ के प्रभाव से माता रेणुका के गर्भ से चार पुत्र हुए। रुमण्वान, सुशेन, वसु और विश्वावसु। पांचवें पुत्र का नाम रखा गया राम। 
बाद में शिव जी की कृपा से उन्हें परशु (फरसा) नामक दिव्य अस्त्र मिला, इसलिए वे परशुराम कहलाए। परशुराम बचपन से ही असाधारण थे। वे ब्राह्मण कुल में जन्मे थे, लेकिन उनमें योद्धा का तेज था। उन्होंने शस्त्र विद्या, धनुर्विद्या और तपस्या में महारत हासिल की। उनके गुरु भगवान शिव थे। शिव जी ने प्रसन्न होकर उन्हें दिव्य परशु (axe) प्रदान किया, जिससे उनका नाम परशुराम पड़ा।
परशुराम जी की माता रेणुका अत्यंत पतिव्रता थी। वह रोज गंगा जी से जल लाकर पति की पूजा करती थी। एक बार जल लाते हुए एक गंधर्व को देखकर क्षण भर के लिए मन में विचार आया । इस वजह से उनका पतिव्रता थोड़ा प्रभावित हुआ ओर जल का घड़ा नीचे गिर गया। ऋषि जमदग्नि को क्रोध आया ओर उन्होंने अपने पुत्रों को माता का सिर काटने का आदेश दिया । पहले चार पुत्रों ने मना कर दिया, लेकिन परशुराम जी ने पिता की आज्ञा का पालन किया ओर माता का शीश काट दिया।
 

बाद में ऋषि जमदग्नि ने प्रसन्न होकर परशुराम जी को वरदान मांगने को कहा , तब परशुराम जी ने कहा वे उनकी माता को माफ करदे और उन्हें पुनः जीवित कर दे। ऋषि ने उन्हें पुनः जीवित कर दिया। इस घटना से परशुराम जी की गुरु भक्ति, पितृ आज्ञा का महत्व स्पष्ट होता है ।

शिव जी से परशु प्राप्ति ओर योद्धा बनना

परशुराम जी ने शिवजी की घोर तपस्या कि, फल स्वरूप शिव जी ने उन्हें अपना फरसा दिया। जिससे परशुराम जी अजेय हो गए। वो ब्राह्मण होते हुए भी एक अजेय योद्धा बन गए। 
उनका नाम इसलिए परशु+राम हुआ। वे ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी अधर्म का नाश करने वाले योद्धा बने। पुराणों में उन्हें शिव का अंश भी कहा जाता है।

पिता की हत्या और 21 बार क्षत्रिय संहार

परशुराम जी की सबसे प्रसिद्ध और क्रोध भरी घटना पिता जमदग्नि की हत्या से जुड़ी है। एक बार सहस्त्रार्जुन (कार्तवीर्य अर्जुन) नामक राजा जमदग्नि ऋषि के आश्रम में आया। ऋषि के पास कामधेनु गाय थी, जिससे वे अतिथि सत्कार करते थे। सहस्त्रार्जुन ने गाय मांगी, लेकिन ऋषि ने मना कर दिया। 
क्रोध में आकर सहस्त्रार्जुन ने जमदग्नि ऋषि की हत्या कर दी और आश्रम लूट लिया। जब परशुराम जी आश्रम पहुंचे तो उन्होंने पिता का कटा शरीर देखा। क्रोध से उनका रक्त उबल उठा। उन्होंने शपथ ली कि वे पृथ्वी से समस्त अधर्मी क्षत्रियों का 21 बार संहार करेंगे। 
 फिर क्या था – परशुराम जी ने अपना दिव्य परशु उठाया और सहस्त्रार्जुन सहित उसके सैनिकों का संहार कर दिया। इसके बाद उन्होंने पूरे भारत में घूम-घूमकर 21 बार क्षत्रियों का वध किया। हर बार नए क्षत्रिय जन्म लेते और फिर परशुराम जी उनका संहार करते।
 इस संहार का उद्देश्य अधर्मी और अत्याचारी राजाओं को समाप्त करना था, जो ब्राह्मणों और साधु-संतों पर अत्याचार करते थे। परशुराम जी ने क्षत्रिय वंश को इतना कमजोर कर दिया कि पृथ्वी क्षत्रिय-विहीन हो गई। बाद में ब्राह्मणों ने क्षत्रिय वंश की रक्षा के लिए नए क्षत्रियों को जन्म दिया। यह कथा हमें सिखाती है कि जब भी अधर्म बढ़ता है, भगवान स्वयं या उनके अवतार उसे नष्ट करते हैं।

रामायण ओर महाभारत में उनकी भूमिका 

परशुराम जी रामायण में भी थे। जब श्री राम जी ने सीताजी की स्वयंवर में शिव जी का धनुष तोड़ा तब वहां वो आए थे। परशुराम जी ने राम जी को पिनाक धनुष दिया था। ओर उनसे युद्ध भी किया था। राम जी की शक्ति देखकर वो प्रसन्न हुए थे। 
महाभारत काल में उन्होंने पितामह भीष्म,गुरु द्रोणाचार्य ओर कर्ण को शिखा दी थी । कर्ण को उन्होंने ब्राह्मण समझ कर शिक्षा दी, बाद में जब उन्हें पता चला तो वो अत्यंत क्रोधित हुए थे। 

एक बार की बात है जब गणेश जी ने परशुराम जी को शिवजी से मिलने के लिए रोक लिया था।  जिससे क्रोधित होकर उन्होंने गणेश जी का एक दांत तोड़ दिया था। 

चिरंजीवी होने का रहस्य

भगवान परशुराम आठ चिरंजीवियों में से एक हैं। अन्य चिरंजीवी हैं – अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और मार्कंडेय। परशुराम जी को चिरंजीवी होने का वरदान शिव जी या विष्णु जी से मिला। वे कलयुग में भी महेंद्र पर्वत पर तपस्या करते हुए मौजूद हैं। कहा जाता है कि वे कल्कि अवतार के गुरु बनेंगे और अधर्म का अंत करने में मदद करेंगे। आज भी कुछ स्थानों पर परशुराम जी के मंदिर हैं जहां उनकी पूजा की जाती है। केरल, महाराष्ट्र, उत्तर भारत और नेपाल में उनके भक्त बड़ी संख्या में हैं।

परशुराम जयंती का महत्व और पूजा विधि

परशुराम जयंती का दिन अक्षय तृतीया के साथ जुड़ा होने से विशेष महत्व रखता है। 
इस दिन किया गया दान अक्षय फल देता है। पूजा विधि: सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
परशुराम जी की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाएं।
फल, फूल, चंदन, दूध और मिठाई चढ़ाएं।
“ॐ परशुरामाय नमः” मंत्र का जाप करें।
ब्राह्मणों को दान दें और गरीबों की मदद करें।
इस दिन क्षमा, धैर्य और धर्म रक्षा का संकल्प लेना चाहिए। 

 आज के युग में परशुराम जी से सीख

आज के समय में परशुराम जी हमें सिखाते हैं कि: माता-पिता की आज्ञा का पालन करना चाहिए।
अधर्म के सामने कभी चुप नहीं रहना चाहिए।
क्रोध को नियंत्रित रखना चाहिए, लेकिन जरूरत पड़ने पर न्याय के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।
ब्राह्मण होने का मतलब सिर्फ जन्म नहीं, कर्म भी है।

परशुराम जी ब्राह्मण थे लेकिन योद्धा बनकर धर्म की रक्षा की। आज हम भी अपने क्षेत्र में सही और गलत के बीच खड़े होकर समाज की मदद कर सकते हैं।


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